दोस्त

तुम्हें तुम्हारे गुण बताकर, 
तुम्हें तुम्हारे अवगुण बताकर,
तुम्हें तुम से मिलवाता है। 

जब तुम गिर जाते हो,
तो तुम्हें चलना सिखाता है,
तुम्हें उठाकर तुम्हें ही, 
तुम्हारी अहमियत बताता है।

जब तुम बोल नहीं पाते हों,
तुम्हारी आवाज़ बनकर, 
सबके कानों में गूँजता है।

बुरा तुम्हारा सुनकर, 
सहन नहीं कर पाता है,
चुपके से दुआ भगवान से माँगकर,
अपने दिल में रख लेता है|

फिर भला तुम्हारा सुनकर, 
हलके से मुस्कुरा देता है। 

यारों अब के समय में,
दोस्तों की गिनती ना बढ़ाते हुये, 
दोस्ती की गहराई बढ़ाये।

मज़े से उनसे मिलकर, 
दो बीते पल , 
दो आने वाले पलों की बात करके,
जिंदगी का लुफ़्त उठाए ।


एक पैग़ाम एक सलाम उस दोस्त को, 
जिसने जीना और हँसना सिखाकर, 
जिंदगी का रंग दिखलाया, 
जिंदगी का मज़ा बढ़ाया ।। 

     ।।डा. निविधा छाबड़ा ।।








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